बिहार में आखिर बिधायक की हत्या कैसे ?

 मनोज जैसवाल  
  बिहार के पूर्णिया से विधायक राज किशोर केसरी की दिन-दहाड़े हत्या ने एक बार फिर उस बहस को हवा दे दी कि राजनीति में अपराधियों या आपराधिक छवि वाले नेताओं को कितनी जगह दी जानी चाहिये. बीजेपी के नेता राज किशोर केसरी की हत्या एक दुर्भाग्यपूर्ण हादसा है और इसे किसी भी तरह से सही नहीं ठहराया जा सकता. लेकिन इस मामले की तह तक अगर जाएं तो ये कहना गलत नहीं होगा कि चार आपराधिक मामलों में लिप्‍त राज किशोर केसरी के प्रति अगर किसी शख्‍स में इतना रोष रहा होगा, तो इसकी कोई बड़ी वजह भी होनी चाहिये.

 
रूपम पाठक ने किन परिस्थितियों में राज किशोर केसरी पर हमला करने का मन बनाया, इसपर गौर करने कि जरूरत है. ज्यादा नहीं, 6 महीने पहले ही, पेशे से टीचर, रूपम पाठक ने राज किशोर केसरी पर बलात्कार का आरोप लगाया था. आरोप में रूपम ने दर्ज करवाया था कि तीन साल तक लगातार केसरी और उनके एक सहयोगी ने रूपम का शारिरिक शोषण किया. मामले की जांच आगे बढ़ती इससे पहले ही उसे दबाने की कोशिशें तेज हो गयीं. सर पर विधानसभा चुनाव था और केसरी पूर्णिया से बीजेपी के उम्‍मीदवार तभी बन सकते थे, जब उनके ऊपर लगा ये मामला खत्म होता. किन परिस्थितियों में रूपम पाठक ने मामले को वापस लिया, ये शायद रूपम के अवाला किसी को नहीं पता होगा. लेकिन मामला वापस लेने के 4 महीनों के भीतर ही, केसरी पर जानलेवा हमला करना, इस बात का सूचक है कि रूपम ने स्वेछा से इस मामले को वापस नहीं लिया होगा.
तो क्या रूपम को ऐसा लगने लगा था कि वो चाहे कुछ भी कर ले, उसे इंसाफ नहीं मिल सकेगा? क्या रूपम को ये एहसास था कि कानून से उसे मदद नहीं मिल सकती, इसलिए उसे अपने हाथों में कानून को लेना ही पड़ेगा? 
एक स्त्री के लिए इससे बड़ा अपमान क्या हो सकता है कि कोई पुरुष उसकी अस्मिता के साथ खिलवाड़ करे और इस जधन्य अपराध के लिए उस पुरुष को सजा भी ना मिले? वो शख्‍स उस महिला को हमेशा दिखे और एहसास कराये कि जो भी कर लो, मुझे कोई छू तक नही सकता? इससे बड़ी तौहीन क्या हो सकती है? रूपम की मनस्थिति का आंकलन शायद मनोवैज्ञनिक बेहतर कर सकें. लेकिन ये कोई रॉकेट साइंस नहीं है कि आत्मग्‍लानी और रोष से ग्रसित रूपम ने शायद केसरी को सजा दिलाना ही उसके जीवन का मकसद बना लिया होगा. वरना तमाम सर्मथकों की भीड़ के आगे राज किशोर केसरी पर हमला करने का जोखिम शायद रूपम नहीं उठाती.
वजह तो पुलिसिया कार्रवाई के बाद शायद सामने आ जाये, लेकिन इस हादसे को सत्ता के पायदान पर आसीन लोगों को खतरे की घंटी समझना चाहिये. ये जरूर सोचना चाहिये कि दुराचार जब हद से पार हो जाये, तो विद्रोह होता है. फिल्मकार प्रकाश झा कि फिल्म 'गंगाजल', बिहार की पृष्टभूमि पर बनी थी और उस फिल्म में महिलाओं ने जब शोषण के खिलाफ आवाज बुलंद की तो कुछ यूं ही हुआ था जो पूर्णिया में देखने को मिला. सामाजिक नजारिये से इस हादसे को अगर बिहार प्रशासन ने कानून की बारीकियों में दबा दिया, तो भविष्य में ऐसी विकृति एक विस्फोटक बदलाव का प्रतीक बन सकती है.

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