हमने क्या अपनी अंतरात्मा को फांसी पर लटका दिया है


मनोज जैसवाल : सुप्रीम कोर्ट ने ग्राहम स्टेंस और उनके दो बच्चों को जिंदा जला देने वाले दारा सिंह को फांसी की सजा नहीं दी। उसने एक अन्य धर्म के प्रचारक और उसके दो मासूम बच्चों को जिंदा जला देने की क्रूरता को फांसी के लायक नहीं माना। ऐसे में कुछ लोगों के लिए यह समझ पाना मुश्किल है कि आखिर वह कौन सा काम है जिसको सुप्रीम कोर्ट इतना जघन्य मानता है कि उसके लिए किसी को फांसी दी जा सके। या किसी हत्या को विरल में भी विरल (रेयरेस्ट ऑफ रेयर) मानने का आधार क्या हो सकता है।

इस सिलसिले में कुछ पुराने ऐसे केसों की फाइल देखी जा सकती है, जिनमें सुप्रीम कोर्ट पहले फांसी की सजा सुना चुकी है, या ऐसी सजा को खारिज कर चुकी है। इनमें जो मामले काफी चर्चा में आए, वे राजनीतिक और गैर-राजनीतिक दोनों तरह के थे। पहले कुछ राजनीतिक मामले।

कब फांसी, कब नहीं 
पहला मामला तो नाथूराम गोडसे का है। नाथूराम गोडसे ने गांधी जी की हत्या की थी। गोडसे को लगता था कि गांधी जी पाकिस्तान के साथ पक्षपात कर रहे हैं और उनका जिंदा रहना भारत के लिए नुकसानदेह है। इसी तरह सतवंत सिंह ने इंदिरा गांधी की हत्या की। सतवंत को भी इंदिरा गांधी से शिकायत थी कि इन्होंने स्वर्ण मंदिर में सेना भेजकर सिख धर्म का अपमान किया है।
एक और मामला हुआ राजीव गांधी का। राजीव गांधी हत्याकांड में चार लोगों की फांसी की सजा पर सुप्रीम कोर्ट ने मुहर लगाई। उनमें से एक नलिनी की फांसी की सजा राज्य के राज्यपाल ने माफ कर दी। बाकी तीन की अर्जियां राष्ट्रपति के पास लंबित हैं।

जघन्यता के पैमाने 
इन सभी मामलों की तह में जाएं तो पता चलेगा कि इन हत्यारों के मन में विक्टिम के प्रति वैसी ही नफरत या गुस्सा था जैसा कि दारा सिंह के मन में था। फिर कैसे उन हत्यारों का कृत्य इतना जघन्य हो गया कि उनके लिए फांसी से कम सजा नहीं हो सकती जबकि दारा सिंह का काम एक सामान्य, रोजाना की हत्या की श्रेणी में आ गया? क्या सिर्फ इसलिए कि ग्राहम स्टेंस और उनके बच्चे इस देश के प्रधानमंत्री या पूर्व प्रधानमंत्री या राजनीतिक शख्सियत नहीं थे?

लेकिन ऐसा नहीं है कि फांसी की सजा सिर्फ राजनीतिक सुपरस्टार्स की हत्या के मामले में ही मिलती है। अजमल कसाब और अफजल गुरु से भी बहुत पहले का एक मामला याद आता है मकबूल बट्ट का। मकबूल बट्ट जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट का नेता था। बट्ट को 1984 में अमर चंद नामक एक इंसपेक्टर की हत्या के आरोप में फांसी की सजा दी गई थी। फांसी का तात्कालिक कारण यह था कि बट्ट की रिहाई की मांग करते हुए कश्मीरी आतंकवादियों ने इंग्लैंड में भारतीय राजनयिक रवींद्र म्हात्रे को बंधक बना लिया था और मांग पूरी न होने पर उनकी हत्या कर दी थी। अफजल गुरु ने तो किसी की हत्या भी नहीं की। कोर्ट ने उसको जिस अपराध का दोषी करार दिया है वह हत्या का नहीं, संसद पर हमले की साजिश रचने का अपराध है, जिसके दौरान कुछ हत्याएं भी हुईं। लेकिन उसकी फांसी की सजा तो अब भी बरकरार है।

अब देखिए ऐसे मामले , जिनमें आम हत्याओं के केस में भी सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सजा बरकराररखी। एक मामला रंगा - बिल्ला का याद आता है। 1978 में इन दोनों ने दिल्ली में भाई - बहनसंजय और गीता चोपड़ा को बंधक बना लिया था और बाद में उनकी हत्या कर दी थी। इनको चारसाल बाद फांसी दी गई।

एक और मामला है पुणे का मशहूर जोशी - अभ्यंकर मर्डर केस। पुणे के आर्ट कॉलेज के चारविद्यार्थियों को 1976-77 में 10 हत्याओं का दोषी पाया गया था। ये सारे लूट और हत्या के मामले थे।1983 में उन्हें फांसी दी गई। 1995 में ऑटो शंकर नामक एक सीरियल किलर को रेप और हत्या के6 मामलों में फांसी की सजा दी गई। बलात्कार और हत्या का एक और केस है धनंजय चटर्जी का ,जिसने 14 साल की हेतल पारिख की रेप के बाद हत्या कर दी थी। 2004 में धनंजय को फांसी दे दीगई।

दारा सिंह के वकील की मुख्य दलील यह थी कि ग्राहम स्टेंस और उनके बच्चों की हत्या की गवाहीदेने वालों ने दारा सिंह को उनके मकान या गाड़ी में आग लगाते नहीं देखा था। यानी अदालत में यहनहीं साबित किया जा सका कि उसने इरादतन और ठंडे दिमाग से इन लोगों की हत्या की। ऐसे मेंयह फांसी देने लायक रेयरेस्ट ऑफ रेयर मामला नहीं बनता।

आम नागरिक के लिए यह तकनीकी फर्क समझ पाना मुश्किल है। एक इंसपेक्टर की हत्या रेयरेस्टऑफ रेयर क्त्राइम हो सकता है ! दिल्ली में दो बच्चों की हत्या रेयरेस्ट ऑफ रेयर क्राइम हो सकता है! एक पूर्व प्रधानमंत्री की हत्या रेयरेस्ट ऑफ रेयर क्त्राइम हो सकता है ! एक लड़की से बलात्कारऔर हत्या रेयरेस्ट ऑफ रेयर क्त्राइम हो सकता है ! लेकिन धार्मिक नफरत के कारण एक बूढ़े पादरीऔर उसके दो छोटे - छोटे बच्चों को जला देना रेयरेस्ट ऑफ रेयर क्राइम नहीं है !!!

धर्म की आड़ 
इन बच्चों की तस्वीर देखिए और सोचिए। सवाल उनके ईसाई होने या उनके पिता के धर्मप्रचारक होने का नहीं है। अगर वे बच्चे हिंदू या मुसलमान होते और किसी जोसफ या हामिद या दीपक ने उनकीहत्या की होती , तो भी अपराध का स्वरूप और मंशा वही होती। अफजल गुरु की फांसी की सजाबहाल रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 2006 में कहा था कि इस कांड ने देश की अंतरात्मा को हिलाकर रखदिया है। तो क्या दारा सिंह के मामले में हुए फैसले के बाद हम यह मानें कि ग्राहम स्टेंस और उनकेबच्चों की हत्या ने देश की अंतरात्मा को नहीं हिलाया ? या हम यह मान लें कि इस देश की आत्मा ही मर चुकी है , बल्कि यूं कहें कि हमने अपने देश की आत्मा को ही सर्वसम्मति से फांसी पर लटकादिया है! 

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